अल्लमा इक़बाल की शायरी
अल्लमा इक़बाल एक मशहूर शायर हैं जिन्हें आज कौन नहीं जानता । अल्लमा इक़बाल 9 नवम्बर 1877 मे सियालकोट में कश्मीरी परिवार में पैदा हुए ।
Allama Iqbal ने ना सिर्फ शायरी में बहतरीन मुकाम बनाया बल्कि वह एक अच्छे लेखक, फिलॉसफर, वकील, पॉलिटिशीयन और एक अच्छे मुसलिम थे। Allama Iqbal ki shayari में अल्लमा इकबाल के लिए लिखता हूँ ।
था वह मानिन्दे- खुर्शीद रस्ते दिखा गया ।
खुदी के फ़लसफ़े से परदा उठा गया ।
खुदी को कर बुलंद इतना की हर तकदीर से पहले ।खुदा बंदे से खुद पुछे बता तेरी रज़ा क्या है ।
अल्लमा इकबाल एक फारसी और उर्दू शायर हैं । इसलिए उनके कुछ बड़े लफ्ज़ो के अर्थ देने की कोशिश की है । ताकि समझने में आसानी हो ।
तेरे इश्क की इनतेहा चाहता हूँ
मेरी सादगी देख के क्या चाहता हूँ ।
दुआ :
दुआ तो दिल से मांगी जाती है, जुबां से नहीं इकबाल,
कबूल तो उसकी भी होती हैं जिसकी जुबां नहीं होती ।
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परिन्दो की दुनिया का दरवेश हूँ मैं,
के शाहीन बनाता नहीं आशियाना।
माना कि तेरे दिद के काबिल नहीं हूँ मैं
तू मेरा शौक देख, मेरा इन्तजार देख ।
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ढूंढते फिरता हूँ ए इकबाल अपने आप को,
आप ही गोया मुसाफ़िर, आप ही मंजिल हूँ मैं ।
तू शाहीन है, परवाज काम है तेरा,
तेरे सामने आसमां और भी है ।
दिल से जो बात निकलती हैं असर रखती है,
पर नहीं ताकत- ए- परवाज मगर रखती हैं ।
अमल से जिंदगी बनती हैं जन्नत भी जहन्नुम भी,
ये खाकी अपनी फ़ितरत में ना नूरी है ना नारी है ।
उठाएं कुछ वर्ख लाले ने, कुछ नर्गिस ने, कुछ गूल ने
चमन में हर तरफ बिखरी हुई है दास्ताँ मेरी ।
बे-खतर कूद पडा आतिश-ए-नमरूद में इश्क
अखल है महू-ए-तमाशा-ए-लब व बाम अभी
पानी पानी कर गई मुझको कलंदर की यह बात
तू झुका जब गैर के आगे, न तन तेरा न मन।
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तेरी जिंदगी इसी से, तेरी आबरू इसी से
जो रही खुदी तो शाही, ना रही तो रूसियाही।
ठहर ठहर के बहुत दिलकूशां है यह मंजर,
जरा में देख तो लु ताबनाकि-ए-शमशीर ।
दिलकूशां = दिल को भाने वाला
ताबनाकि-ए- शमशीर = तलवार की चमक
छेडो सुरूद एसा, जाग उठे सोने वाले
रहबर हैं काफिलो की ताब-ए-जबी तुम्हारी ।
रहबर= गाईड
ताब-ए-जबी = पेशानी की चमक
खुदी को कर बुलंद इतना की हर तकदीर से पहले
खुदा बंदे से खुद पुछे बता तेरी रज़ा क्या है ।
खुदावंद यह तेरे सादा दिल बंदे किधर जाए
के दरवेशी भी अय्यारी, सुलतानी भी अय्यारी ।
दिल-ए-बिना भी कर खुदा से तलब
आँख का नूर दिल का नूर नहीं ।
दिल-ए-बिना = दिल की आंख
तलब= मांगना
Allama Iqbal ki shayari
सबक पढ फिर सदाकत का, अदालत का, शूजाअत का
लिया जाएगा तुझसे काम दुनिया की इमामत का
सदाकत = सच्चाई
अदालत = इंसाफ
शूजाअत= बहादुरी
इमामत = लीडरशिप
उख्खाबी रूह जब बेदार होती हैं जवानों में
नजर आती हैं उसको अपनी मंजिल आसमानो में ।
उख्खाब= परिंदे का नाम
एक सजदा जिसे तू गिरां समझता है
हजार सजदों से देता है आदमी को निजात ।
गिरां= महंगा
कोई कब किसी से जलता है
हर कोई अपने मूकद्दर से लडता है ।
बुतों से तुझको उम्मीदें खुदा से नाउम्मिदी
मुझे बता तो सही और काफिरी क्या है ।
सजदों के अवज़ फिरदोस मिले यह बात मुझे मंजूर नहीं
बेलौस इबादत करता हूँ, बंदा हूँ कोई मज़दुर नही ।
फिरदोस = जन्नत
बेलौस = बेफ़ायदा
नशा पिला के गिराना तो सबको आता है
मज़ा तो तब है गिरते को थांब ले साख़ि ।
साख़ि = शराब पिलाने वाला
यूँ तो सय्यद भी हो, मिर्जा भी हो, अफ़गान भी हो
तुम सभी कुछ हो, बताओ तो मुसलमान भी हो।
वह सजदा, रूह-ए-जमिन जिस से कांप जाती थी
उसी को आज तरस्ते है मिंबर-व-महराब
दयारे-इश्क में अपना मुकाम पैदा कर ।
नया ज़माना नई सुबह व शाम पैदा कर ।
Allama Iqbal ki shayari
अपने किरदार पर डाल कर परदा ।
हर शख्स कह रहा है जमाना खराब है ।
मिटा दे अपनी हस्ती को अगर कुछ मर्तबा चाहे ।
के दाना खाक में मिल कर गुले-गुलजार होता है ।
हरम-ए-पाक भी, अल्लाह भी, क़ुरान भी एक ।
क्या बड़ी बात थी जो होते मुसलमां भी एक ।
खफा जो इश्क में होते है वो खफा ही नहीं ।
सितम ना हो मोहब्बत में कुछ मजा ही नहीं ।
हैरत है कि तालीम व तरक्की में हैं पीछे ।
जिस कौम का आग़ाज़ ही "इक़रा" से हुआ था ।
मसजिद तो बना दी शब भर में, इमां की हरारत वालों ने ।
मन अपना पुराना पापी है बरसों में नमाज़ी बन ना सका ।
हुस्ने-किरदार से नुरे-मुजस्सम हो जा ।
के इबलीस भी तुझे देखे तो मुसलमां हो जाये ।
सौदागीरी नही ये इबादत खुदा की है ।
ए बेखबर जज़ा की तमन्ना भी छोड़ दें ।
दिल में खुदा का होना लाजिम है इक़बाल ।
सजदों में पड़े रहने से जन्नत नहीं मिलती ।
जिक्र-ए-शबे-फीराक़ से वहशत उसे भी थी ।
मेरी तरह किसी से मोहब्बत उसे भी थी ।
ना तु जमीं के लिए, ना आसमां के लिए ।
ये जहाँ है तेरे लिए, तु नहीं जहां के लिए ।
दवा की तलाश में रहा दुआ को छोड़ कर ।
मैं चल ना सका दुनिया में ख़ताओ को छोड़कर ।
हैरान हु में अपनी हसरतों पर इकबाल ।
हर चीज खुदा से मांग ली मगर खुदा को छोडकर ।
अंदाज़े-बयाँ गरचे बहुत शोक नहीं है ।
शायद की तेरे दिल में उतर जाय मेरी बात ।
मैं रो-रो कर कहने लगा दर्द-ए-दिल ।
वह मुंह फेर कर मुसकुराने लगे ।
Allama Iqbal ki shayari
लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी ।
जिंदगी शमा की सुरत हो खुदा या मेरी ।
ना समझोगे तो मिट जाओगे ए हिदुस्तां वालो ।
तुम्हारी दासताँ तक ना होगी दास्तानों में ।
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी ।
सदियों से रहा है दुश्मन दौरे-जमा हमारा।
मन की दौलत हाथ आती है तो फिर जाती नहीं ।
तन की दौलत छाँव है आता है धन जाता है धन।
निशान यही है जमाने में जिंदा कौमों का ।
कि सुबह व शाम बदलती है उनकी तकदीरे ।
ये राज किसी को मालूम नहीं मोमिन,
ख़ारी नजर आता है हकीकत में है कुरान ।
ख़ारी = जिसे कुरान याद हो
हजारों साल नर्गिस अपनी बेनुरी पे रोती है ।
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा ।





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